रोजाना24न्यूज: श्री हरि विष्णु 16 कलाओं से परिपूर्ण, भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में उच्च वृष के चंद्रमा में रात के ठीक 12:00 बजे मध्यरात्रि को मथुरा के कारावास में जनार्दन चतुर्भुज गोविंद ने स्वयं कृष्ण के रूप में धरा पर जन्म लिया था, हिंदू ग्रथों के अनुसार, कंस के बढ़ रहे अत्याचारों से मुक्ति दिलाने के लिए भगवान विष्णु ने जन्माष्टमी के दिन कृष्ण के रूप में आठवां अवतार लिया था, समग्र विश्व में कृष्ण जन्माष्टमी उत्सव भगवान कृष्ण की लीलाओं की झांकियां के साथ हर्षोल्लास धूमधाम के साथ मनाया जाता है कई जगह इसी दिन दही हांडी उत्सव भी मनाया जाता है
6 सितंबर को ही क्यों मनाई कृष्ण जन्माष्टमी
भगवान के जन्म के समय जितने भी शुभ संयोग थे इस बार वह सभी संयोग कई वर्षों बाद 6 सितंबर को रात के 12:00 बजे हैं,अष्टमी तिथि,रोहिणी नक्षत्र,वृष राशि का चंद्र,बुधवार का दिन,जयंती नाम का योग विजय नामक मुहूर्त समस्त शुभ संयोग बने हुए हैं।
वशिष्ठ संहिता, विष्णु पुराण, वायु पुराण, अग्नि पुराण, स्कंद पुराण, ब्रह्मवैवर्तपुराण आदि अनेक धर्म शास्त्रों के अनुसार जयंती नाम जन्माष्टमी का व्रत करने का अनंत फल कहा गया है।
1- यम की नारकीय पीड़ा यातनाएं नहीं सहना पड़ता है।
2- सौ जन्मों के पापों से मुक्त हो जाता है।
3- लक्ष्मी जी का सदा स्थिर वास होता है।
4- इच्छित अति दुर्लभ वस्तु प्राप्त हो जाती है।
5- विषम रोग शोक अकाल मृत्यु का भय दूर हो जाता है।
6- करोड़ एकादशी वृत के फल का पुण्य प्राप्त होता है।
7- 21 पीडियों को तार कर मुक्ति मोक्ष दिलाता है।
8- निसंतान योग,दुर्भाग्य कलह, को दूर कर वंश की वृद्धि करता है।
भाद्रपद कृष्ण जन्माष्टमी तिथि शुरू
-06 सितंबर 2023, दोपहर 03.37
भाद्रपद कृष्ण अष्टमी तिथि समाप्त
– 07 सितंबर 2023, शाम 04.14
रोहिणी नक्षत्र शुरू
-06 सितंबर 2023, सुबह 09:20
रोहिणी नक्षत्र समाप्त
– 07 सितंबर 2023, सुबह 10:25
श्रीकृष्ण पूजा का समय
-6 सितंबर 2023, रात्रि 11.57
-07 सितंबर 2023, प्रात: 12:42
पूजा अवधि-46 मिनट
मध्यरात्रि का क्षण-प्रात: 12.02
जन्माष्टमी 2023 व्रत पारण समय
देर रात 12:42 बजे के बाद पारण कर लेंगे। वहीं जो लोग अगले दिन सुबह पारण करते हैं, वे 7 सितंबर को सुबह 06:02 के बाद पारण करेंगे।
जन्माष्टमी पूजन विधि 2023
जन्माष्टमी पर रात्रि पूजन का विशेष महत्व होता है रात्रि पूजन के लिए श्री कृष्ण के लिए झूला सजाएं। इसके बाद श्रीकृष्ण को पंचामृत या गंगाजल से अभिषेक करें और फिर उनका श्रृंगार करें। इस दिन श्रीकृष्ण का बांसुरी, मोर मुकुट, वैजयंती माला कुंडल, पाजेब, तुलसी दल आदि से श्रृंगार किया जाता है। इसके साथ ही पूजा में उन्हें मक्खन, मिठाई, मेवे,मिश्री और धनिया की पंजीरी का भोग लगाया जाता है. पूजा में श्रीकृष्ण की आरती जरूर करें।
आचार्य राज किशोर शर्मा राजगुरुजी
